
(ब्रह्मास्त्र विद्या)
गुरुजी (गिर्राज दीक्षित जी धर्मसंघ) का साधना पक्ष अत्यंत प्रभावशाली और शास्त्रीय है। उनके पूज्य गुरुदेव श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज (समर्थ श्री) के सान्निध्य में उनका साधना पथ प्रगाढ़ हुआ है।
उनके पूज्य गुरुदेव श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज (समर्थ श्री) की प्रेरणा से और जगतजननी माँ की कृपा पाकर गुरुजी माँ की उपासना और साधना करते रहे। इन्होंने माँ बगलामुखी के अनेक प्रयोग सिद्ध किये हैं।
गुरुजी ने अखंड ब्रह्माण्ड नायिका माँ बगलामुखी जो दस महाविद्याओं में से आठवें स्थान पर विराजित हैं जिन्हें प्रायः पीतांबरा या ब्रह्मास्त्र विद्या / स्तम्भिनी विद्या के नाम से भी जाना जाता है उनके कई प्रयोग अपने पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा से शास्त्रोक्त व सांगोपांग विधि अनुसार किए।
आचार्य जी को अपने पूज्य गुरुदेव भगवान का ब्रह्मास्त्र विद्या प्रयोग प्राप्त हुआ जिसके फलस्वरूप आचार्य जी ने छत्तीस-अक्षरी मंत्र का रात्रि पुरश्चरण किया जो कि अत्यंत कठिन और अनुशासित प्रयोग माना जाता है। यह पुरश्चरण 26 माह में पूर्णतः मौनयुक्त सफल हुआ इसमे कई सारे ऐसे नियम होते है जिन नियमों का पालन करना होता है। तभी ये प्रयोग सांगोपांग की अवस्था तक पहुंच पाता है।
आचार्य जी द्वारा कई वर्षों तक उपासना करना उनकी एकाग्रता, अनुशासन और संकल्प शक्ति को दर्शाता है। माँ बगलामुखी की कृपा से उन्हें मंत्र-प्रसाद प्राप्त हुआ।
मंत्र के छत्तीस लाख जपों द्वारा सम्पन्न यह पुरश्चरण साधक के लिए सिद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा का द्वार खोलता है।
अखिल भारतीय धर्मसंघ की परंपरा से जुड़ाव यह दर्शाता है कि सम्पूर्ण साधना वैदिक एवं शास्त्रोक्त मर्यादाओं के अनुसार सम्पन्न होती है।
श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी के सान्निध्य में की गई साधना समाज में आध्यात्मिक चेतना और धर्म रक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
गुरुजी ने पिछले 10 वर्षों की साधना के दौरान अनेक प्रयोग सिद्ध किए, जिनमें माँ बगलामुखी के प्रयोग प्रमुख रहे।